जब परमेश्वर स्वयं की शपथ खाता है
जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

जॉन पाइपर द्वारा भक्तिमय अध्ययन

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

जब परमेश्वर ने शपथ खाने के लिए अपने से बड़ा कोई न पाया तो उसने यह कहते हुए अपनी ही शपथ खाई, “निश्चय मैं तुझे आशीष दूँगा और निश्चय ही मैं तुझे बढ़ाऊँगा।” (इब्रानियों 6:13-14)

एक ऐसा जन है जिसका मूल्य और आदर और गौरव और बहुमूल्यता और महानता और सुन्दरता और प्रतिष्ठा अन्य सभी मूल्यों से बढ़कर है — दस हज़ार गुणा बढ़कर — और वह जन स्वयं परमेश्वर है। इसलिए जब परमेश्वर शपथ खाता है, तो वह अपनी ही शपथ खाता है।

यदि वह उससे और ऊँचे स्तर पर जा सकता था, तो वह चला जाता। क्यों? आपकी आशा में आपको दृढ़ प्रोत्साहन देने के लिए। स्वयं की शपथ खाने के द्वारा परमेश्वर कह रहा है कि उसके लिए हमें आशिष देने की प्रतिज्ञा के वचन को तोड़ना उतना ही असम्भव है जितना कि यह असम्भव है कि वह स्वयं को कभी तुच्छ समझे।

परमेश्वर विश्व में सर्वाधिक मूल्यवान है। परमेश्वर से अधिक मूल्यवान या अद्भुत कुछ भी नहीं है। इसलिए, परमेश्वर स्वयं अपनी अर्थात् परमेश्वर की शपथ खाता है। और ऐसा करने के द्वारा वह कहता है, “मैं चाहता हूँ कि तुम मुझ पर उतना अधिक भरोसा करो जितना सम्भव है।” क्योंकि इब्रानियों 6:13 कहता है, कि यदि और सम्भव होता, तो उसने हमें वह दे दिया होता। “जब परमेश्वर ने शपथ खाने के लिए अपने से बड़ा कोई न पाया तो उसने यह कहते हुए अपनी ही शपथ खाई।”

हमारा परमेश्वर ऐसा है, वह परमेश्वर जो स्वयं में आपकी अटल आशा को यथासम्भव प्रेरित करने के लिए प्रयासरत है। इसलिए, शरण के लिए परमेश्वर के पास भागें। जगत की उथली और स्वयं को पराजित करने वाली आशाओं से फिरें, और परमेश्वर पर अपनी आशा रखें। शरणस्थान और आशा की चट्टान के रूप में परमेश्वर के जैसा न कोई जन है और न ही वस्तु।